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चंबा में लोहड़ी मनाने की प्राचीन परंपरा अभी भी कायम…..

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नेक सिंह ठाकुर (ट्राइबल टूडे न्यूज)चंबा।

भले ही पूरे भारतवर्ष में हर स्थान पर लोहड़ी का त्यौहार बड़ी ही श्रद्धा वह धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन चम्बा मुख्यालय में इस त्यौहार को मानने की परम्परा बिलकुल ही अनूठी व अनोखी है। सदियों से राजाओं के कार्यकाल से चली आ रही एक हज़ार वर्ष प्राचीन इस परंपरा को चम्बा के स्थानीय लोग आज भी उसी ल्हेजे से मानते चले आ रहे है।यह है एक हज़ार वर्ष प्राचीन नगरी जिसको की चम्बा के नाम से जाना जाता है।  राजा साहिल वर्मन ने दसवी शताब्दी ब्रह्मपुर भरमौर से आकर इस रियासत को बसाया था। पर यहां पहुंचकर देखा तो इस स्थान में भूतप्रेतों का अधिकतर बसेरा हुआ करता था जिससे उनकी प्रजा परेशान रहने लगी तथापि इन भूत प्रेतों से कैसे निजात पाई जाए और मुक्ति मिले शहर के हर कोने-कोने में 14,मढ़ीयो की स्थापना कर दी। जिनको की लोग लगातार एक महीना रात के समय जलाते थे और उसकी देखरेख मुहल्ले में बसे सभी बूढ़े और बच्चे किया करते थे। ऐसा करने से भूत प्रेतों का आतंक तो समाप्त हुआ वहीं साथ में शांति भी कायम हो गई। सैकड़ो वर्ष से चली आ रही यह अद्भुत प्रथा जिसको की आज भी चंबा के स्थानीय लोग बड़ी धूम-धाम से मनाते चले आ रहे हैं। 
इसकी शुरुआत सबसे पहले राजस्वी मुहल्ला सुराड़ा के भगवान शिव के मन्दिर से की जाती है। इस मंदिर से एक लकड़ी नुमा त्रिशूल जिसको की मशाल यानी मुशाहरा कहा जाता है बनाया जाता है जिसकी कि विधिवत तरीके से पूजा कर बैंड बाजे के साथ मढ़ियों में डूबने की तैयारी की जाती है।  इसी के साथ चौन्तड़ा मुहल्ला में भी इसी तरह का एक और मशाल यानी की मशाहरा तैयार किया जाता है जो बजीर मशाहरा के नाम से जाना जाता है रात ठीक ग्यारह बजे राज मुशारे की कई लोग अपने कंधे पर उठा आगे के लिए चल पड़ते हैं। दूसरी तरफ से बजीर मढ़ी से भी मुसहरा चल पड़ता है और एक जगह पर इन दोनों का मिलन करवाया जाता है जहां पर लोग खूब शोरशराबा मचाते हैं बाद में बजीर वापिस अपनी मढ़ी में चला जाता है जाता है और राज मशाहरा पुरे शहर की मंडियों में डुबाया जाया है जिसे चम्बा की सुख-समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है चम्बा में इस तरह की अनोखी लोहड़ी अपने में एक अलग ही इतिहास को दर्शाती है। 
इस बारे चम्बा के प्रबुद्ध स्थानीय लोगों का कहना गई कि राजाओं द्वारा चम्बा शहर जब बसाया गया तो उसे समय यहां भूत प्रेतों का वास हुआ करता था। दैत्य शहर के लोगों को मार दिया करते थे इस बात से परेशान हो राजा ने बाहर के राज्यों से तांत्रिक को बुलाया। तांत्रिकों ने यह उपाय बताया कि भूत प्रेतों को हर हफ्ते किसी एक की नरबलि दी जाए लेकिन इसके लिए कोई भी तैयार नहीं हो रहा था राजा ने फिर एक बार इस समस्या के हाल के लिए विद्वानों को बुलाया विद्वानों ने के अनुसार यह तय किया गया कि हर साल यहां राक्षसों को मनुष्य का खून दिया जाएगा और इसके लिए उन्होंने लोहड़ी पर्व को कुछ अलग तरीके से मनाने का फैसला किया। शहर में 14 मोहल्लों में अलग-अलग मढ़ियाँ स्थापित की गई जिन में 7 मेल और 7 फीमेल मडिया बनाई गई। आज भी इस प्रथा को चंबा के छोटे बड़े लोग बड़ी खुशी खुशी मनाते है और अपनी अपनी मढियो में बड़े बड़े लकड़ियों के ठेलो को जलाते हुए नाचते गाते दिखाई देते है।