प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी भूमि कब्जाने वालों को दिए किस्म बताने के आदेश
दो हफ्ते में बताएं, वन भूमि है या शामलात
अवैध कब्जों को नियमित करने से जुड़ी नीति की वैधता पर सुनवाई
कहा, शपथ पत्र दायर कर दें जानकारी
संवाददाता विनोद ठाकुर ट्राइबल टुडे,
प्रदेश हाई कोर्ट में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों को नियमित करने से जुड़ी नीति की वैधता पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने सरकारी भूमि पर बगीचे और भवन निर्माण करने वाले याचिकर्ताओं को दो सप्ताह के भीतर कब्जाई गई भूमि की किस्म बताने के आदेश जारी किए। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश बीसी नेगी की खंडपीठ ने अवैध कब्जाधिरियों को शपथ पत्र दायर कर यह जानकारी देने के आदेश जारी किए। कोर्ट के आदेशानुसार याचिकर्ताओं को बताना होगा कि उनके द्वारा कब्जाई सरकारी भूमि क्या वन भूमि है या शामलात अथवा अन्य किस्म की है। प्रार्थी कृष्ण चंद सारटा ने वर्ष 2014 में मुख्य न्यायाधीश के नाम पत्र लिख कर बताया था कि लोगों ने जंगलों को काटकर घर, खेत व बगीचे बना लिए हैं और वन विभाग की मिलीभगत से इन्हें बिजली पानी के कनेक्शन भी मुहैया करवा दिए गए हैं। कोर्ट ने पत्र पर संज्ञान लिया और वन विभाग को समय समय पर जारी आदेशनुसार अवैध बगीचों को काट कर वन भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त करवाने के आदेश दिए। वन विभाग ने कोर्ट के आदेशानुसार वन भूमि से सेब के पेड़ों को काटने का अभियान छेड़ा, परंतु कुछ कब्जाधारियों ने विभिन्न अदालतों में मामले दायर कर इस मुहिम को लंबा लटकाने की कोशिश की। इसके पश्चात हाई कोर्ट ने ऐसे मामले देख रहे न्यायालयों को तय समय सीमा के भीतर वन भूमि पर अवैध कब्जों से जुड़े मामलों को निपटाने के आदेश दिए। कई बार कोर्ट ने वन विभाग को आदेश दिए कि वह तय सीमा के भीतर वन भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त करवाए।
