अब बिना खेत जोते होगी आलू की खेती, सौरव शर्मा की तकनीक से आएगी खुशहाली, लेबर-पानी पर कम आएगा खर्च
विनोद ठाकुर ट्राइबल टुडे
हिमाचल के साइंटिस्ट सौरव शर्मा की तकनीक से आएगी खुशहाली, लेबर-पानी पर कम आएगा खर्च
हिमाचल प्रदेश के साइंटिस्ट ने बिना खेत जोते पराली में आलू उगाने की नई तकनीक अनुसंधान कर दी है। इसके लिए अब किसानों को खेत को जोतने की जरूरत नहीं होगी और न ही ट्रेक्टर से जुताई का खर्च उठाना पड़ेगा, जिसका सीधा लाभ आलू उत्पादकों को मिलेगा। अब किसानों को आलू की खेती के लिए खेत जोतने का झंझट, ज़्यादा लेबर का खर्च और पानी की लागत भी कम होगी। प्रदेश में आलू उगाने को लेकर इस नई तकनीक से आलू उत्पादकों को बेहतर मुनाफा मिल सकेगा और फसल उगाने में किसानों का कम खर्चा भी होगा। वहीं फसल की बंपर पैदावार से किसान आत्मनिर्भर बनेंगे। इस रिसर्च को कृषि अनुसंधान केंद्र अकरोट के साइंटिस्ट डा. सौरभ शर्मा ने कर दिखाया है, जो कि पूरी तरह से सफल रहा है।
कृषि अनुसंधान केंद्र अकरोट ऊना में आलू उत्पादन की इस तकनीक पर काम कर रहे कृषि वैज्ञानिक डा. सौरव शर्मा ने बताया कि इस तकनीक से हर किस्म का आलू तैयार होगा। इसमें आलू के उत्पादन में किसानों को खेत में मेंढ और नाली बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आलू पर मिट्टी नहीं चढ़ानी पड़ेगी। खरपतवारनाशी हानिकारक रसायन का छिडक़ाव नहीं होगा, क्योंकि धान की पराली से मल्चिंग के करण खरपतवार नहीं उग पाएंगे। डीसी ऊना जतिन लाल ने भी इस नई रिसर्च की तारीफ की है। चिंतपूर्णी के विधायक सुदर्शन बबलू ने भी कृषि वैज्ञानिक सौरव शर्मा के प्रयासों की सराहना की है।
ऐसे करनी होगी बिजाई, तीन बार पानी की जरूरत
इस तकनीक में आलू की बिजाई के लिए पराली का इस्तेमाल होगा। आलू के बीज को नमीयुक्त खेत में रखकर इसे पराली से ढक दिया जाएगा। फिर समयानुसार फसल को पानी से सिंचित किया जाएगा वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक से आलू की फसल को केवल तीन बार ही पानी की जरूरत पड़ती है, जो कि किसानों के लिए सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू है। इस नई तकनीक का फायदा पर्यावरण को भी होगा, क्योंकि किसानों को पराली जलानी नहीं पड़ेगी।
