Himachal में टूटते पहाड़ों को संभालंगे पेड़-पौधे, भू-स्खलन रुकेगा
विनोद ठाकुर ट्राइबल टुडे
हिमाचल में हल्की बारिश से दरक रहे पहाड़ों को संभालने में अब बायो इंजीनियरिंग तकनीक यानी पेड़ पौधों का इस्तेमाल अहम कदम साबित हो सकती है। बीते करीब 14 सालों से इस तकनीक के इस्तेमाल का प्रयास हो रहा है, लेकिन अभी भी बड़े पैमाने पर सडक़ें की खुदाई के बाद बायो इंजीनियरिंग तकनीक का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि फोरलेन में तबदील हो रहे नेशनल हाइवे को लेकर जिन इलाकों में खुदाई की गई है, उनमें भू-स्खलन लगातार जारी है। दरअसल, बायो इंजीनियरिंग में पहाड़ की खुदाई के बाद भू-स्खलन की वजह बनने वाली मिट्टी को थामने का प्रयास किया जाना है। इसमें नालियों, गेबियन दीवारों समेत सडक़ के साथ ढलान वाली जगहों पर बांस समेत अन्य वनस्पति उगाने की भी योजना तैयार की गई है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना में पहली बार 2010 में केंद्र सरकार की मंजूरी के बद बायो इंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया गया था।
ग्रामीण इलाकों में सडक़ खोदने के समय बनी ढलान पर इसके परिणाम बेहतर रहे थे, जबकि अब फोरलेन निर्माण में बड़ी-बड़ी पहाडिय़ों को काटने के बाद उनसे गिरने वाले पत्थर और मलबे को संभालने के लिए कम ऊंचाई की दीवारें लगाई जा रही हैं, जो भूस्खलन को रोक पाने में समर्थ नहीं है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कालका-शिमला नेशनल हाइवे पर देखने को मिला है। यहां बीते एक दशक से ज्यादा समय से काम चल रहा है, लेकिन बरसात के दौरान एनएचएआई को पहाड़ की तरफ वाली डबल लेन के ज्यादातर हिस्सों को बंद रखना पड़ रहा है। इसके अलावा बरसात के दौरान नुकसान भी एनएचएआई को झेलना पड़ रहा है। अब यदि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की बायो इंजीनियरिंग तकनीक को अपनाया जाता है, तो भविष्य में सडक़ों के सुधार की संभावना बढ़ जाएगी। बायो इंजीनियरिंग निर्देशों के अनुसार ठेकेदारों को साइटों की निगरानी और रखरखाव के लिए पर्यवेक्षकों को नियुक्त करने की आवश्यकता होती है। उधर, विश्व बैंक के वरिष्ठ पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी वनस्पति से पर्यावरणीय खतरों को कम करने में इसकी भूमिका पर जोर दिया है।
भविष्य में किए जा सकते हैं प्रयोग
एनएचएआई के क्षेत्रीय अधिकारी अब्दुल बासित का कहना है कि फोरलेन का निर्माण तय मानकों पर हो रहा है। भू-स्खलन से बचने के लिए विशेषज्ञों की सलाह पर टनल निर्माण पर जोर दिया गया है। भविष्य में बायो इंजीनियरिंग को लेकर भी प्रयोग किए जा सकते हैं। एनएचएआई हिमाचल में फोरलेन को हर मौसम के अनुकूल और सुरक्षित बनाने पर काम कर रही है।
भू-स्खलन की घटनाओं को रोकने में मिलेगी मदद
पीडब्ल्यूडी के प्रमुख अभियंता एनपी सिंह का कहना है कि बायो इंजीनियरिंग तकनीक से सडक़ों को सुरक्षित करने के साथ ही भविष्य में भू-स्खलन की घटनाओं को रोकने में मदद मिल सकती है। प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना में 2010 में इस प्लान पर शुरुआती दौर में काम हुआ था। पीएमजीएसवाई में नियम लगातार बदलते रहे हैं। इस बार जर्मन तकनीक से सडक़ें बनाने के निर्देश मिले हैं। पहली बार हिमाचल में इसका भी प्रयोग हो रहा है। भविष्य में केंद्र सरकार ऐसा फैसला करती है, तो इसका लाभ ग्रामीण इलाकों में मिलेगा।
बायोइंजीयरिंग तकनीक ऐसे काम करती है
बायो इंजीनियरिंग तकनीक में मिट्टी को स्थिर करने और पारिस्थितिकी तंत्र के लचीलेपन को बढ़ाने में वनस्पति का रणनीतिक रोपण और अन्य कार्बनिक पदार्थों को शामिल किया जाता है। पौधों और उनकी जड़ प्रणालियों के प्राकृतिक गुणों का उपयोग करके, मृदा बायो इंजीनियरिंग पर्यावरणीय खतरों को कम करने और परिदृश्य बहाली को बढ़ावा देने के लिए एक स्थायी और लागत प्रभावी दृष्टिकोण प्रदान कर सकती है। यह विधि विशेष रूप से नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और भू-स्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त क्षेत्रों में प्रभावी है। हरित बुनियादी ढांचे ने एक ही सीजन में जड़ें जमा लीं और धीरे-धीरे ढलानों को मजबूत किया, जो पिछले साल की बाढ़ के प्रभावों को बेहतर ढंग से झेलने में सक्षम थे। बायो इंजीनियरिंग सडक़ों के किनारे ढलानों की स्थिरता में भी सुधार कर सकती है, इससे भू-स्खलन का खतरा कम होगा। अधिक पानी को अवशोषित करके बायोइंजीनियर्ड ढलानें अपवाह और उसके बाद कटाव, जल जमाव और क्षति को कम कर सकती हैं।
