17 साल में बंदरों की नसबंदी पर खर्च किए 28 करोड़, 57 फीसदी अब भी मुक्त
प्रदेश में 43 फीसदी बंदरों की ही हो पाई नसबंदी, 57 फीसदी अब भी मुक्त
संदीप भारद्वाज ट्राइबल टुडे
हिमाचल में बंदरों की नसबंदी पर 28 करोड़ रुपए की मोटी रकम अब तक खर्च हो चुकी है। इस भारी भरकम बजट से एक लाख 86 हजार 501 बंदरों की नसबंदी हो पाई है। वन्य प्राणी विभाग ने 17 साल पहले इस प्रोजेक्ट को लांच किया था और अभी तक 43 फीसदी बंदरों की ही नसबंदी हो पाई है, जबकि 57 फीसदी बंदर अब भी बिना नसबंदी हैं और इस लंबे अरसे में नसबंदी से छूटे बंदरों की वजह से इनकी आबादी लगातार बढ़ रही है। अभी तक राज्य के शत-प्रतिशत बंदर इस योजना के दायरे में नहीं आ पाए हैं। 2019 में आखिरी बार वन्य प्राणी विभाग ने बंदरों की गिनती पूरी की थी। वन्य प्राणी विभाग एक बंदर की नसबंदी पर डेढ़ से दो हजार रुपए खर्च कर रहा है। वन्य प्राणी विभाग ने इस प्रोजेक्ट को लांच करने से ठीक पहले वर्ष 2004 में बंदरों की गिनती की थी। उस समय प्रदेश में बंदरों की तादाद तीन लाख 17 हजार थी।
इसके बाद वन्य प्राणी विभाग ने 2019 में अभियान के बीच बंदरों की गिनती पूरी की तो यह संख्या एक लाख 36 हजार पर ठहर गई। जबकि नसबंदी का अभियान 2007 में शुरू किया गया था। इसके लिए वन्य प्राणी विभाग ने सात नसबंदी केंद्र स्थापित किए थे। लेकिन इन नसबंदी केंद्रों का भी ज्यादा फायदा विभाग नहीं उठा पाया है। हाल के वर्षों में बंदरों की तादाद शहरी क्षेत्रों में ज्यादा बढ़ी है। बड़ा सवाल अब भी यही है कि जीरो से 43 फीसदी पहुंचने में विभाग को 17 साल लग गए, तो 100 फीसदी तक पहुंचने में कितना समय लगेगा। इस अवधि के दौरान बिना नसबंदी के घूम रहे 57 फीसदी बंदरों को नियंत्रित करने के लिए वन्य प्राणी विभाग के पास क्या योजना रहेगी।
