लोकसभा चुनाव : एक हार मिली और छोड़ दी राजनीति
लोकसभा पहुंचने वाले पहले भगवाधारी संत स्वामी ब्रम्हानंद की कहानी
ट्राइबल टुडे
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में आने वाले हमीरपुर जिला की राजनीति में कुर्सी के लिए नेता कब पाला बदल दें, इसकी कोई भी गारंटी नहीं है। सियासी खेल में नेता पाला बदलने में बदनाम हैं ही, लेकिन सत्ता की चमक और धमक में संत भी पलक झपकते ही पाला बदल देते हैं। ऐसा ही एक अनोखा मामला साल 1971 के चुनाव में सामने आया था, जिसमें क्षेत्र के महान संत स्वामी ब्रम्हानंद महाराज ने दोबारा सांसद बनने के लिए जनसंघ पार्टी छोडक़र कांग्रेस में एंट्री ले ली थी। 90 के दशक में राममंदिर आंदोलन के समय साधू-संत बड़ी संख्या में सियासत में आए और विधायक व सांसद भी बने, लेकिन आजादी के बाद हुए पहली बार लोकसभा पहुंचने वाले संत का नाम स्वामी ब्राह्मानंद था।
गोरक्षा के लिए सडक़ से सांसद तक आवाज उठाने वाले संत स्वामी ब्रह्मानंद भले ही जनसंघ के टिकट पर लोकसभा सदस्य चुने गए, लेकिन कांग्रेसी हो गए। हमीरपुर जिला के राठ क्षेत्र के बरहरा गांव के रहने वाले शिवदयाल का जन्म चार दिसंबर, 1894 में हुआ था। ब्राह्मानंद ने 23 साल की आयु में ही संन्यास ले लिया था। बाद में स्वामी ब्राह्मानंद महाराज के नाम से ये विख्यात हुए। ब्रह्मानंद अंग्रेजों के खिलाफ सडक़ पर आ गए थे और महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा गणेश विद्यार्थी के भी संपर्क में रहे। स्वाधीनता आंदोलन में स्वामी ब्रम्हानंद कई बार जेल भी गए थे। स्वामी जी ने जीवन पर्यंत पैसे को कभी हाथ नहीं लगाया था, इसीलिए क्षेत्र के सभी लोग इन्हें मानते थे। उन्होंने पूरा जीवन भिक्षा लेकर अपना जीवन यापन किया।
पहली बार वाजपेयी ने संत पर लगाया था दांव
पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 1967 में जनसंघ पार्टी की स्थापना की थी। स्वामी ब्रम्हानंद महाराज की ईमानदारी से वह इतने प्रभावित हुए कि स्वामी जी को अपनी पार्टी में शामिल कर साल 1967 के आम चुनाव में हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से टिकट दे दिया। चुनावी महासमर में पहली बार आए स्वामी जी ने कांग्रेस के दिग्गज मन्नूलाल द्विवेदी को पराजित कर जीत का परचम फहराया था। उन्हें 1,38,130 वोट मिले थे, जबकि मन्नूलाल को 79,257 वोट मिले थे। मन्नूलाल द्विवेदी ने साल 1952 से लेकर 1962 तक लगातार जीत दर्ज की थी, लेकिन संत के प्रभाव के कारण उन्हें चुनाव में हार मिली थी।
पाला बदलने की भनक लगते ही संत से मिलने आए थे अटल
स्वामी ब्रम्हानंद ने सांसद बनने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में तमाम कार्य कराए। इसी बीच उनकी कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से संपर्क होने से जनसंघ पार्टी के नेता भी सकते में आ गए थे। ऐसे में जनसंघ के संस्थापक अटल बिहारी बाजपेयी पहली बार स्वामी जी के जन्मदिन पर चार दिसंबर, 1969 को राठ आए थे। स्वामी जी को बधाई देने के साथ ही अटल ने ब्रम्हानंद डिग्री कालेज के सांस्कृतिक कार्यक्रम का उद्घाटन कर सभा में बड़ी बात भी कही थी। उन्होंने कहा था कि राजनीति बड़ी रपटीली होती है। कब कौन फिसल जाए, पता ही नहीं चलता। बाद में स्वामी जी ने इंदिरा के प्रभाव में आकर जनसंघ पार्टी छोड़ दी थी।
संसदीय क्षेत्र के आम चुनाव में स्वामी जी नहीं लगा सके हैट्रिक
स्वामी जी 1971 के आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट से दोबारा सांसद भी बने थे। उन्हें 52 फीसदी मत मिले थे, जबकि बीकेडी के प्रत्याशी तेज प्रताप सिंह को 31.3 फीसदी मत मिले सके। स्वामी जी ने हैट्रिक लगाने के लिए 1977 के आम चुनाव में फिर कांग्रेस के टिकट से किस्मत आजमाया, लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। उन्हें सिर्फ 27.5 फीसदी मत मिले, जबकि बीकेडी प्रत्याशी तेज प्रताप सिंह ने 54.1 फीसदी वोट हासिल किया था। हार से नाराज स्वामी जी ने फिर कभी चुनाव लडऩे का ऐलान करने के साथ ही राजनीति ही छोड़ दी थी।
