Himachal PradeshPolitics

कांग्रेस में गंगूराम मुसाफिर की घर वापसी से बिगड़े समीकरण

Spread the love

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में बने थे कांग्रेस की हार का कारण

संवाददाता विनोद ठाकुर ट्राइबल टुडे

लंबे समय से प्रदेश की कांग्रेस सरकार में मंत्री के साथ विधानसभा के अध्यक्ष व कई अन्य महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे गंगूराम मुसाफिर की कांग्रेस में घर वापसी से लोकसभा चुनाव की शिमला सीट पर अंक गणित के फेर में हलचल हो गई है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार का कारण बने गंगूराम मुसाफिर की घर वापसी ने भाजपा के माथे पर शिकन डाल दी है। गंगूराम मुसाफिर ने वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव आजाद उम्मीदवार के रूप में लड़ा था। यदि कांग्रेस उन्हें विधानसभा चुनाव से पूर्व मनाने में सफल हो जाती, तो भाजपा की हार तय थी। गंगूराम मुसाफिर को विधानसभा के चुनाव के बाद पार्टी से निष्कासित कर दिया था। गंगूराम मुसाफिर की घर वापसी ने भाजपा खेमे में संकट खड़ा कर दिया है। गौर हो कि 1982 में वन विभाग की नौकरी से इस्तीफा देने के बाद निर्दलीय चुनाव जीतकर मुसाफिर अल्पमत रही कांग्रेस सरकार के लिए सरकार बनाने में अहम साबित हुए थे। मुसाफिर की घर वापसी के बाद भाजपा प्रत्याशी की लोकसभा चुनाव में दिक्कतें भी बढ़ती हुई नजर आती हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि जिस विधानसभा क्षेत्र पच्छाद से भाजपा प्रत्याशी सुरेश कश्यप तालुक रखते हैं उसी से गंगूराम मुसाफिर भी संबंध रखते हैं। गौर हो कि गंगूराम मुसाफिर पहले वन विभाग में नौकरी करते थे। साल 1982 में वह नौकरी से इस्तीफा देकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे थे।
उस दौरान चुनाव में कांग्रेस के पास बहुमत नहीं था लिहाजा जीआर मुसाफिर के समर्थन से सरकार बनी थी। मुसाफिर को उस दौरान कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया था। जीआर मुसाफिर 1985 से 2007 तक कांग्रेस के टिकट पर विधायक रहे हैं। मुसाफिर को सबसे पहले वन एवं उद्योग फिर शिक्षा मंत्री, सहकारिता विभाग मंत्री, परिवहन मंत्रालय और ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री भी बनाया गया। 2003 से लेकर 2008 तक मुसाफिर विधानसभा अध्यक्ष रहे। 2009 में पुन: लोकसभा सीट पर उतारा गया था, जिसमें उनकी हार हुई थी। इस सीट पर सोलन से ताल्लुक रखने वाले भाजपा प्रत्याशी वीरेंद्र कश्यप की जीत हुई थी। वीरेंद्र कश्यप दो बार शिमला संसदीय सीट पर सांसद रहे।
तीसरी बार उनकी जगह सुरेश कश्यप को टिकट दिया था, जिसमें सुरेश कश्यप की जीत हुई थी। विधायक रहे सुरेश कश्यप के सांसद बनने के बाद पच्छाद विधानसभा क्षेत्र के लिए उपचुनाव हुआ था। इस उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रीना कश्यप जीती थी, जबकि मुसाफिर की जगह भाजपा से कांग्रेस में आई दयाल प्यारी को मैदान में उतारा था। मुसाफिर ने पार्टी से बगावत करते हुए बतौर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और हार गए थे। अब यदि मुसाफिर उपचुनाव में बगावत न करते तो निश्चित ही दयाल प्यारी भारी मतों से विजय हासिल करती। मुसाफिर की घर वापसी के बाद पूरे विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस एकजुट हो चुकी है। -एचडीएम
40 साल बाद लड़ा था आजाद चुनाव
गंगूराम मुसाफिर करीब 40 वर्षों के बाद 2022 के चुनाव में निर्दलीय मैदान में उतरे थे। चुनाव में हार के बाद उनके समर्थक उनके साथ मजबूत स्तंभ की तरह जुड़े रहे। जीआर मुसाफिर की घर वापसी के बाद न केवल कांग्रेसी खेमे में उत्साह है। गंगूराम मुसाफिर पूर्व मुख्यमंत्री रहे स्व.वीरभद्र सिंह के हनुमान भी कहलाते थे। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के द्वारा 2017 में उन्हें योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया था।