भरमौर के बारह भंसौ में मनाया गया गोंत्री उत्सव शिव पार्वती विवाह का प्रतीक है उत्सव
भरमौर के बारह भंसौ में मनाया गया गोंत्री उत्सव शिव पार्वती विवाह का प्रतीक है उत्सव
जनजातीय क्षेत्र भरमौर के बारह भंसौ क्षेत्र में गोंत्री उत्सव धूमधाम से मनाया गया शिव पार्वती विवाह के तौर पर मनाए जाने वाले गोंत्री उत्सव को इस क्षेत्र के लोग सदियों से मनाते आए है इस उत्सव को जनजातीय क्षेत्र भरमौर की तीन पंचायतों नयाग्रा, बजोल तथा ग्रोंडा के लोग मुख्य रूप से मनाते हैं इसके अलावा वो लोग भी इस उत्सव को मनाते है जिनकी शादी इस दिन हुई होती है इस उत्सव में जिस प्रकार गद्दी संस्कृति में शादियों में घरों की दीवारों में कामदेव की रंगोली बनाई जाती है और उसमे वर वधु के नाम लिखे जाते है बिल्कुल उसी तरह इस रंगोली में भगवान शिव तथा माता पार्वती का नाम लिखा जाता है इस उत्सव में भगवान शिव की बारात पहले दिन आती है और दूसरे दिन माता पार्वती को साथ लेकर वापिस चली जाती है इस मौके पर इन पंचायतों की महिलाएं परम्पारिक परिधानों को पहनकर भगवान शिव तथा माता पार्वती की स्तुति करती है इसके अलावा इस दिन कई प्रकार के पकवान भी हर घर में बनाए जाते है और लोग खूब नाचते गाते है बता दें कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित बारह भंसौ क्षेत्र में रहने वाले कई परिवार मूलभूत सुविधाओं की तलाश में सालों पहले जिला कांगड़ा की ओर पलायन कर गए थे अब यही नियमित रूप से रह रहे हैं जिसकी वजह से जिला कांगड़ा में रहने वाले गद्दी समुदाय के लोग बड़ी धूमधाम से इस उत्सव को मनाते हैं !
एक मान्यता के अनुसार भगवान शिव की बारात को रोकने के लिए माता पार्वती ने मोटी बर्फ की चादर उपहार स्वरूप बिछाई थी जिसके बाद माना जाता है कि सर्दियों के बाकी दिनों में भरमौर में बर्फ गिरे न गिरे लेकिन गोंत्री उत्सव में जरूर बर्फ गिरेगी बहरहाल जिन पंचायतों में यह उत्सव मनाया जाता है वहां मूलभूत सुविधाओं का अकाल है जिसके कारण सर्दियों में इन पंचायतों के 80 प्रतिशत लोग जिला कांगड़ा को पलायन कर जाते है जिसकी वजह से आज यह उत्सव भरमौर से ज्यादा जिला कांगड़ा में ज्यादा मनाया जाता हैसौ क्षेत्र में गोंत्री उत्सव धूमधाम से मनाया गया शिव पार्वती विवाह के तौर पर मनाए जाने वाले गोंत्री उत्सव को इस क्षेत्र के लोग सदियों से मनाते आए है इस उत्सव को जनजातीय क्षेत्र भरमौर की तीन पंचायतों नयाग्रा, बजोल तथा ग्रोंडा के लोग मुख्य रूप से मनाते हैं इसके अलावा वो लोग भी इस उत्सव को मनाते है जिनकी शादी इस दिन हुई होती है इस उत्सव में जिस प्रकार गद्दी संस्कृति में शादियों में घरों की दीवारों में कामदेव की रंगोली बनाई जाती है और उसमे वर वधु के नाम लिखे जाते है बिल्कुल उसी तरह इस रंगोली में भगवान शिव तथा माता पार्वती का नाम लिखा जाता है इस उत्सव में भगवान शिव की बारात पहले दिन आती है और दूसरे दिन माता पार्वती को साथ लेकर वापिस चली जाती है इस मौके पर इन पंचायतों की महिलाएं परम्पारिक परिधानों को पहनकर भगवान शिव तथा माता पार्वती की स्तुति करती है इसके अलावा इस दिन कई प्रकार के पकवान भी हर घर में बनाए जाते है और लोग खूब नाचते गाते है !
बता दें कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित बारह भंसौ क्षेत्र में रहने वाले कई परिवार मूलभूत सुविधाओं की तलाश में सालों पहले जिला कांगड़ा की ओर पलायन कर गए थे अब यही नियमित रूप से रह रहे हैं जिसकी वजह से जिला कांगड़ा में रहने वाले गद्दी समुदाय के लोग बड़ी धूमधाम से इस उत्सव को मनाते हैं एक मान्यता के अनुसार भगवान शिव की बारात को रोकने के लिए माता पार्वती ने मोटी बर्फ की चादर उपहार स्वरूप बिछाई थी जिसके बाद माना जाता है कि सर्दियों के बाकी दिनों में भरमौर में बर्फ गिरे न गिरे लेकिन गोंत्री उत्सव में जरूर बर्फ गिरेगी बहरहाल जिन पंचायतों में यह उत्सव मनाया जाता है वहां मूलभूत सुविधाओं का अकाल है जिसके कारण सर्दियों में इन पंचायतों के 80 प्रतिशत लोग जिला कांगड़ा को पलायन कर जाते है जिसकी वजह से आज यह उत्सव भरमौर से ज्यादा जिला कांगड़ा में ज्यादा मनाया जाता है।
