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चंबा में धूमधाम से मनाया गया सूही मेला …….

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ऐतिहासिक तीन दिवसीय सूही मेला रानी सुनयना देवी के चिन्ह को सूही मढ़ में मंदिर परिसर में स्थापित करने के साथ ही आरंभ हो गया। मंगलवार को पिंक पैलेस से रानी सुनयना के चिन्ह को राजपरिवार की कन्या व नगर परिषद चंबा अध्यक्ष नीलम नैय्यर की अगुवाई में भव्य शोभायात्रा के साथ सूहीमढ़ स्थित मंदिर ले जाया गया। जबकि सदर विधायक नीरज नैयर ने इस ऐतिहासिक पर्व में बतौर मुख्यातिथि शिरकत कर सूही माता को शीश नवाजे। वहीं सूही मढ़ में माता के चिन्ह की स्थापना के साथ ही श्रद्धालुओं का मंदिर में पहुंचने का सिलसिला आरंभ हो गया है। तीन दिनों तक माता के चिन्ह को श्रद्धालुओं के दर्शनों हेत सूहीमढ़ व मलूण/बलोटा गांव स्थित थानों में रखा जाएगा। जहां सूही माता के प्रति आस्था रखने वाले शहर के विभिन्न समुदाय के लोग माता के दरबार में हाजिरी भरकर पूजा-अर्चना करेंगे। मंगलवार को सूही मेले के पहले दिन मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए सैंकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं उपस्थिति दर्ज करवाई। उधर, सूहीमढ़ में गद्दी समुदाय की महिलाओं का घुरेही नृत्य मेले का मुख्य आकर्षण केंद्र बना रहा। वहीं इन तीन दिनों के मेले में सांझ पहर सूही माता सेवा समिति के तत्त्वावधान में मेला अवधि के दौरान चौंतड़ा मोहल्ला में लोकगायक पारंपरिक बसोआ गायन करेंगे। जबकि राजनौण पर सूही मेला को लेकर सजी अस्थायी दुकानों पर लोगों ने जमकर खरीददारी के अलावा चटपटे व्यंजन खाने का लुत्फ भी उठाया। चंबा रियासत की रानी सुनयना प्रजा की प्यास बुझाने की खातिर जिदा जमीन में दफन हो गई थीं। जब चंबा नगर की स्थापना के समय वहां पर पानी की बहुत समस्या थी। इस समस्या को दूर करने के लिए चंबा के राजा ने नगर से करीब दो मील दूर सरोथा नाला से नगर तक कूहल द्वारा पानी लाने का आदेश दिया। राजा के आदेशों पर कूहल का निर्माण कार्य किया गया और कर्मचारियों के प्रयासों के बावजूद इसमें पानी नहीं आया। एक रात राजा को स्वप्न में आकाशवाणी सुनाई दी जिसमें कहा गया कि कूहल में तभी पानी आएगा जब पानी के मूल स्त्रोत पर रानी या एक पुत्र को जीवित जमीन में दफना दिया जाए। राजा इस स्वप्न को लेकर काफी परेशान रहने लगा। इस बीच रानी सुनयना ने राजा से परेशानी की वजह पूछी तो उसने स्वप्न की सारी बात बता दी। लिहाजा रानी ने खुशी से प्रजा की खातिर अपना बलिदान देने की बात कह डाली। रानी सुनयना के जीवितशदफन होने के लिए सबको मना भी लिया। कहा जाता है कि जिस वक्त रानी पानी के मूल स्त्रोत तक गई तो उसके साथ अनेक दासियां, राजा, पुत्र और हजारों की संख्या में लोग भी पहुंच गए थे। बलोटा गांव से लाई जा रही कूहल पर एक बड़ी क्रब तैयार की गई और रानी साज-श्रृंगार के साथ उसमें जब क्रब में प्रवेश कर गई तो पूरी घाटी आंसुओं से सराबोर हो गई। कहा जाता है कि क्रब से जैसे-जैसे मिट्टी भरने लगी, कूहल में भी पानी चढ़ने लग पड़ा। चंबा शहर के लिए आज भी इसी कूहल में पानी बहता है। जोकि बीते इतिहास की साक्षी है। जिसे आज भी चंबा के लोग विशेषकर औरतें अत्यन्त श्रद्धा से पूजती हैं। प्रति वर्ष रानी की याद में 15 चैत्र से पहली बैशाखी तक मेले का आयोजन किया जाता है जिसे सूही मेला कहते हैं।